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धरती चिपको वाली......

सुलग रही है कैसे देखो, धरती! चिपको वाली गौरा की। द्युतसभा की पांचाली लगती, धरती! चिपको वाली गौरा की।। धृतराष्ट्र खड़े मौन साधकर, पांडव हैं मुंह ताक रहे। कौन बचाये लाज धरा की, एक दूजे की राह तके।। मौन सभी हैं इस सूरत पर, चिपको वाली धरती की। मौन यँहा है क्रांतिवीर, जो कसमें खाते गौरा की।। गौरा की सन्तानें चुप हैं, चुप साधे सिरमौर यँहा। दवानल वन निगल रहै हैं, अब वनवासी छिपे कँहा।। हैं कौन सभा के दुशासन, कौन है शकुनी-दुर्योधन।। हर शख्स सत्य से अवगत है। लेकिन कुचल रहा वो अंतर्मन।।