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मई 3, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कहने वाले...

नज़र आते नहीं खुद को मजदूरों का खैरख्वाह कहने वाले। मजदूरों को भाई और उनकी बीबियों को बहन कहने वाले।। दौर-ए-गुरबत में खो गए हैं कंही खुद को इंसान कहने वाले। ताबेदार सियासत हो गये खुद को हमारा रहनुमा कहने वाले।।

सम्मान करने से छूट तो नहीं रहे कोरोना योद्धा❓

सम्मान करने से छूट तो नहीं रहे कोरोना योद्धा❓ .... कंही जल्दीबाजी के इस दौरे में हम कुछ कोरोना योद्धाओं के काम को अनदेखा तो नहीं कर रहे? कंही कोई ऐसा योद्धा तो नहीं जो सम्मान करते वक्त हमारे सम्बोधन में बार-बार छूट रहा है? तो जवाब है हाँ की छूट रहे हैं बहुत से योद्धा जिनका हम अभी तक नाम नहीं ले सके उनका आभार नहीं कर सके। जिनमें हैं वो लोग जो खामोशी से बस इस महामारी में उनको दी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। वो हैं आशा, आंगनवाड़ी कार्यकत्रियां, विधुत निगम, जल संस्थान और संचार विभाग के योद्धा जो कंही गांवों में होम कोरनटाइन लोगों पर निगरानी कर रहे है, तो कंही गर्भवती और धात्री माताओं को पोषाहार उपलब्ध करा रहे हैं। जो लाकडाउन में आपके जीवन का हिस्सा बन चुके संचार और बिजली की जरूरतों को पूरा करने में जुटे हुए हैं, और जीवन की सबसे आवश्यक जरूरत पानी की आपूर्ति में जुटे हैं।  तो एक सेल्यूट तो इन योद्धाओं के लिए भी बनता है।

उजाले छल रहे हैं...

उजाले छल रहे हैं यहां और  अंधेरे साथ  देते हैं।  कैसा दौर-ए-उल्फत है, कि इश्क नफरतों से है।। दिलों में सबके छलावा है, निगाहें  सब  फरेबी हैं। यँहा सब गैर हो गए अपने, पराए लगते अपने हैं।। हुकूमत कर रही है नफ़रत, फकीरी में  मुहब्बत है। बाजार-ए-सियासत है ये कि जयचन्दों की मंडी है।। हर आंख में शोले हैं, दिलों  में आग जलती है।  ये उनवान है अपना या खात्मे की ये तैयारी है।। उजाले छल रहे हैं यहां और  अंधेरे साथ  देते हैं।  कैसा दौर-ए-उल्फत है, कि इश्क नफरतों से है।।