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सितंबर 26, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

...तो क्या गांधी के ग्राम स्वराज की ओर लौट रही कांग्रेस?

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.. गांधी जयंती मनाने को लेकर लंबे अरसे से बहुत उत्साह जैसा कुछ दिखाई नहीं देता!  अब जँहा आम लोगों के लिये 2 अक्टूबर का दिन छुट्टी का दिन होता है। वंही सरकारी कार्यालयों में काम करने वालों और सामाजिक जीवन में दिख रहे लोगों के लिए इस पर्व पर "भारत छोड़ो आंदोलन" के अगुवा रहे "मोहन दास करम चंद गांधी" के सिद्धांतों को मन या बेमन से याद करने की बाध्यता सी रह गयी है... ऐसा भी नहीं कि देश के शत-प्रतिशत लोग गांधी दर्शन को बीते दिनों की बात मानते हों, लेकिन अधिसंख्य लोग ऐसे हैं। बल्कि बड़ी संख्या तो "गांधी दर्शन" को पढ़े बिना ही सुनी सुनाई बातों पर अपनी राय कायम किये हुए हैं। जो गांधी के भारत में (जँहा मृत्यु के बाद भी अपने पूर्वजों के नाम पर कौवों को भोजन करवाने और पितृपक्ष में गोलोकवासी परिजनों में आस्था के चलते पूजन की परम्परा के निर्वहन की विशिष्ठ संस्कृति को पोषित करता हो।) गांधी की प्रासांगिकता को परिलक्षित करता है। .... हाँ ये हो भी क्यों नहीं! जब गांधी के सिद्धांतों पर राजनीति करने का दावा करने वाले ही जब छुट्टी बिताने के नाम पर गांव जाने के बजाय व...

रोमांच, कोतुहल, सौंदर्य और साहसिक पर्यटन का खजाना : डियारिसेरा बुग्याल

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चमोली जिला साहसिक पर्यटन के लिए खजाने से कम नहीं है। लेकिन जानकारी के अभाव में आज भी कई गुमनाम पर्यटक स्थल आज भी पर्यटकों की पहुंच से दूर हैं। ऐसा ही एक पर्यटक स्थल है जोशीमठ ब्लॉक के करछौं गांव के शीर्ष पर स्थित डियारिसेरा। रोमांच, कौतूहल ओर प्राकृति सौंदर्य से लबरेज डियारीसेरा बुग्याल साहसिक पर्यटन के लिए बेहद मुफीद स्थान है। डियारिसेरा कराछौं गांव से 8 किमी की दूरी पर 5 हजार मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। डियारीसेरा बुग्यालों में खिले उच्च हिमालयी फूल जहां आकर्षण का केंद्र हैं। वहीं बुग्याल में स्वतः होने वाले धान और मडुवे की फसल और प्राकृतिक रुप से बनी गूल (नहरें) पर्यटकों के कौतूहल और रोमांच को दोगुना करने वाली है। स्थानीय ग्रामीण इसे धार्मिक मान्यता से जोड़ते हुए यहां होने वाले धान और मंडुवे की खेती वन देवियां (परियां) द्वारा किये जाने की बात कहते हैं। बुग्याल में स्थित हनुमान ताल और भूमियाल मंदिर क्षेत्र में देवताओं की उपस्थित का अहसास करते हैं। डियारिसेरा के पैदल रास्ते से हिमालय की नंदा घुंघुटी, त्रिशूल, नंदा देवी, चौखम्भा, बंदरपुंछू, सप्तकुण्ड पर्वत श्रृखलाओं का दीदार ...