...तो क्या गांधी के ग्राम स्वराज की ओर लौट रही कांग्रेस?
.. गांधी जयंती मनाने को लेकर लंबे अरसे से बहुत उत्साह जैसा कुछ दिखाई नहीं देता! अब जँहा आम लोगों के लिये 2 अक्टूबर का दिन छुट्टी का दिन होता है। वंही सरकारी कार्यालयों में काम करने वालों और सामाजिक जीवन में दिख रहे लोगों के लिए इस पर्व पर "भारत छोड़ो आंदोलन" के अगुवा रहे "मोहन दास करम चंद गांधी" के सिद्धांतों को मन या बेमन से याद करने की बाध्यता सी रह गयी है... ऐसा भी नहीं कि देश के शत-प्रतिशत लोग गांधी दर्शन को बीते दिनों की बात मानते हों, लेकिन अधिसंख्य लोग ऐसे हैं। बल्कि बड़ी संख्या तो "गांधी दर्शन" को पढ़े बिना ही सुनी सुनाई बातों पर अपनी राय कायम किये हुए हैं। जो गांधी के भारत में (जँहा मृत्यु के बाद भी अपने पूर्वजों के नाम पर कौवों को भोजन करवाने और पितृपक्ष में गोलोकवासी परिजनों में आस्था के चलते पूजन की परम्परा के निर्वहन की विशिष्ठ संस्कृति को पोषित करता हो।) गांधी की प्रासांगिकता को परिलक्षित करता है। .... हाँ ये हो भी क्यों नहीं! जब गांधी के सिद्धांतों पर राजनीति करने का दावा करने वाले ही जब छुट्टी बिताने के नाम पर गांव जाने के बजाय व...