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अप्रैल 19, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

इश्क़ करें...

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भूल कर जमाने की नफरतों को चलो इश्क करें। ये मजहबों के फासले भूलकर  चलो इश्क करें।। ख़ाबों को हक़ीक़त बनाने को नया ख़ाब बुने। भूलकर जमाने को  इश्क अपने आप से करें।।

आस की मुछ्याळी

ख़ैरि का दिनों मां अब आस की मुछ्याळी जगो। बीती तें बिसार दे अर भल्यारा का स्विंणा गठ्यो।। ख़ैरि सदनी नि रौंण भुला, आस कु उज्याळु जगो। ल्वे-पस्वे बगे की दिदा, अपणी धरती फयेर सजो।। बोट मुठ कस कमर अर आस की मुछ्याळी जगो। खैरांंई आस बिजाळ, अर  हिकमते  फसल उगो।। यूँ  दिनोंन  मुख लुकांण, विस्वास की डाळी लगो। बीती तें बिसार दे अर भल्यारा का स्विंणा गठ्यो।। खैरी बिना जुग जगत मां सुख कु कुछ मोल नी। धाम बिना छैल कू जन  कखी क्वी   मोल नी।।

अब जीते नहीं हैं हम....

महज दस्तूर जिंदगी के निभा रहे हैं हम। सच है कि जिंदगी अब जीते नहीं हैं हम।। चल रहे हैं रोज नदी के दो किनारों की तरह। अब कभी अपने आप से मिलते नहीं हैं हम।। अदब भी है बहुत  और  फिक्रमन्दी  भी है मगर। अब अपने दिल की चाह को जताते नहीं हैं हम।। दीवार सी खड़ी है जिसे, गिरा नहीं पा रहे हैं हम। अब कभी  अपने  आप  से  मिलते  नहीं हैं हम।। चाहत के संग सलीका भी जानते हैं, लेकिन। अब दिल की चाहत को जताते नहीं हैं हम।। साथ चल रहे हैं मगर हमराह नहीं हैं हम। जिंदगी से अब कभी मिलते नहीं हैं हम।। कैसी आपाधापी है  और  कँहा जा  रहे हैं हम। चाहत में खुशी की खुद से मिलते नहीं हैं हम।। कैसा ख़ाब पाले हैं और क्या जिंदगी जी रहे हैं हम। जिंदगी तो यँहा है मगर न जाने कँहा जा रहे हैं हम।।

तेरे किरदार में ढल रहा हूँ मैं...

हौले-हौले ही सही तेरे किरदार में ढल रहा हूँ मैं।  गुजरी है उम्र अब जिंदगी तुझे समझ रहा हूँ मैं।। तेरे सफर के कारवां ने बहुत कुछ सीखा दिया। तेरे दिए तजुर्बे से  दोस्त-दुश्मन चुन रहा हूँ मैं।। जो कल तलक बने फिरते थे हमारे खैरख्वाह। हाथ में आज उनके ही शमशीर देख रहा हूँ मैं।। पहुंचा हूँ आज जब मैं जवानी के इस मोड़ पर। ठोकरों का भी नफ़ा नुकसान समझ रहा हूँ मैं।। इस सफर में बहुत मिले लफ्जों के कारसाज़। तेरे दिए हुनर से अब उनको परख रहा हूँ मैं।।