.................है ना अजीब?

... जब कभी आपके आसपास की किसी चीज की अचानक कीमत बढ़ती है और आपकी चीज की कीमत बढ़ना तो छोड़ो उसके नाम भी धरातल से खत्म होनी शुरू होती है तो आपको उसकी सही वक्त पता लगती है। वैसे ही राज्य की राजनीति में जनप्रतिनिधियों की स्थिति नज़र आती है। डेढ़ दशक से लगातार राज्य को आयुष प्रदेश, पर्यटन प्रदेश और भी नाम जो याद में भी नहीं से प्रचारित किया जा रहा है पर ताज्जुब की किसी भी नाम पर रत्ती भर काम नहीं हुआ। लेकिन हर पांच साल में ये सब फिर याद आ जाता है। क्योंकि अपने किये कामों की कोई कीमत नहीं रह जाती। बड़ा सवाल की राज्य बनने के बाद जिनकी तेज़ी से तरक्की हुई वो कौन हैं?क्या कभी चाय की दूकान पर अखबार उलटते किसी ताऊ, भाई, ताई, मौसी या कोई भी जिसने राज्य निर्माण में "कोदा झंगोरा खायेंगें, उत्तराखण्ड बनाएंगे" "आज दो अभी दो उत्तराखण्ड राज्य दो" जैसे नारे लगाये ने सोचने की कोशिश की?
लगता नहीं की किसी ने भी सोचा चार लोग चाय की दूकान पर या किसी गोष्ठी में बैठकर शराब पीकर बन्द होने वाले को राज्य आंदोलनकारी होने पर कोसता है। या फिर अधिकारी और नेता को गरिया कर अपनी किस्मत और सरकार के करने का इन्तजार करता है। क्या सोचा की अगर उस दिन भी आप सब जो राज्य बनाने के लिए मुखर हुए थे सिर्फ इन्तजार कर रहे होते की उत्तर प्रदेश सरकार या केंद्र सरकार कुछ करेगी तो क्या राज्य मिलता? तो मुझे लगता है नहीं कभी नहीं! पर सबने कोशिश की किसी ने जेल जाकर किसी ने जान देकर और सबने कैसे ना कैसे पर आज डेढ़ दशक बाद जब हम समझ गए हैं। तो भी हम खुद कुछ नहीं करते।

है ना अजीब?

...जबकि हम खुद को माधो और तीलू जैसे वीरों की थाती से जोड़कर देखते हैं। माधो ने जँहा अपनी धरती को खुशहाल करने के लिए बेटा तक गंवा दिया और दूसरी ने अपनी आन के लिए जान गंवा दी। या तो अब हमें गढ़ कुमाऊं के वीरों से खुद को जोड़ना छोड़ देना चाहिए या अपने विकास के लिए खामोशी को।

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