घुण्ड घुण्डों फुक्या........

.....घुण्ड घुण्डों फुक्या, पर कुतरयांण कख बे ओंणी? (घुटनों घुटनों तक जल गए पर फिर भी बदबू कँहा से आ रही?) ये कहावत हमारे उत्तराखण्ड में आमतौर पर घर गांवों में बुजुर्ग लोग गलती पर गलती करने वालों के लिए प्रयुक्त करते हैं।
.…...और कहावत हमारी है औऱ ये संयोग ही है कि ये कहावत हमारे राज्य की क्षेत्रीय पार्टी पर बिल्कुल सटीक बैठती है। जबकि पूरे देश में वर्तमान में क्षेत्रीय दलों को शक्ति सम्पन मानते हुए, राष्ट्रीय दल क्षेत्रीय दलों को राजनैतिक सहयोगी के रूप में साथ ले रहे हैं। ऐसे समय में भी उक्रांद उत्तराखण्ड में ही अपने लिये जमीन तलाश रही है।
........बल्कि जमीन नहीं तलाश रही नेतृत्व तलाश रही है, दल में राज्य निर्माण के फील्ड मार्शल, राज्य निर्माण आंदोलन के पुरोधा माने जाने वाले नेता मौजूद भी हैं। लेकिन यंहा सभी नेता स्वयं को दूसरे से बड़ा साबित करने के चक्कर में दल को दलदल में तब्दील किये हुए हैं। इन दिनों दल ने एकीकरण की ओर कदम तो बढ़ाया पर स्थिति और भी बुरी हो गयी है, जंहा जीत में मदमस्त और जीत की आस लगाए बड़े नेता एक साथ हो रहे हैं, वंही पोस्टर चिपकाऊ, नारे लगाऊ नेता अपनी अहमीयत को प्रदर्षित करने के चक्कर में बिखराव की राह पर चल पड़े हैं। जो दल के दलदल के खत्म होने की उम्मीद को निराशा में तबदील कर रही है।
जिसे देखते हुए स्थिति ये ही है

घुण्ड घुण्डों फुक्या........

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