आठ दशक से गोपेश्वर में रही है, रामलीला अभिमंचन की परंपरा
पुरातन है चमोली में रामकथा मंचन का इतिहास
पैनखंडा क्षेत्र में ढोल की तालों पर पौराणिक काल से राम कथा का किया जाता है आयोजन
राजा तिवारी
विश्व में सतानत धर्म में आस्था रखने वालों के लिए रामलीला अभिमंचन पौराणिक काल से ही आस्था, आध्यात्म और ऊर्जा के संचार का माध्यम रहा है। हालांकि रामलीला अभिमंचन के शुभारंभ को लेकर इतिहासकार एकमत नहीं है। बावजूद इसके भारत भूमि में रामलीला मंचन का वैभवशाली इतिहास है। देश के विभिन्न हिस्सों में जहां विभिन्न नाट्य शैलियों के साथ रामकथा का मंचन किया जाता है। वहीं 19वीं शताब्दि के बाद वैश्विक स्तर पर प्रवासी भारतियों की मौजूदगी के चलते बाली, म्यांमार, कंबोडिया, थाईलैंड, मॉरिशिस, अफ्रीका, फिजी, गुयाना, मलेशिया, सिंगापुर, दक्षिण अफ्रीका सहित कई देशों में स्थानीय नाट्य शैली के साथ रामलीला मंचन का प्रसार हुआ है। ऐसे में रामलीला के सामाजिक चेतना पर होने वाले प्रभाव को देखते हुए यूनेस्को ने वर्ष 2008 में रामलीला उत्सव को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत भी घोषित किया है।
भारत में रामलीला अभिमंचन को लेकर दो मत प्रचलित हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार रामलीला का अभिमंचन त्रेतायुग से शुरु हुआ माना जाता है। विद्वानों का कहना है कि भगवान राम के वनवास के पश्चात अयोध्यावासियों ने भगवान राम की बाल लीलाओं का अभिमंचन शुरु किया था। जिसके बाद से रामलीला अभिमंचन की परंपरा शुरु हुई है। जबकि कुछ विद्वानों के अनुसार भगवान राम के अनन्य भक्त तुलसीदास जी द्वारा 16वीं शताब्दी में काशी के रामनगर में रामलीला अभिमंचन का शुभारंभ किया गया। ऐसे में हालांकि रामलीलाओं के अभिमंचन के शुभारंभ का सही समय तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन देश के अयोध्या, वाराणसी, वृंदावन, सतना और मधुबनी को रामलीला अभिमंचन का पौराणिक इतिहास मिलता है।
उत्तराखंड में गढवाल क्षेत्र में रामलीला के वर्तमान स्वरुप में मंचन की परम्परा वर्ष 1845 में माना जाता है। जनश्रुति के अनुसार वर्ष 1845 में पहली बार देवप्रयाग में प्रचलित नाट्य शैली में रामलीला अभिमंचन किया गया था। जबकि कुमाऊं मंडल में रामलीला अभिमंचन की परंपरा का शुभारंभ वर्ष 1860 में अल्मोड़ा से शुरु हुआ माना जाता है। जबकि चमोली जनपद के सलूड़-डुंग्रा में आयोजित होेने वाली रम्माण जिसमें ढोल की 18 तालों पर रामायण के दृष्यों का मंचन कलाकारों द्वारा मुखौटा नृत्य के साथ किया जाता है। जो कि उत्तराखंड में रामकथा के अभिमंचन को पुरातन सिद्ध करता है। ऐसे में ऐतिहासिक साक्ष्यों को देखें तो रामलीला अभिमंचन से इतर चमोली में राम कथा का मुखौटों के साथ अभिमंचन का इतिहास वर्तमान शैली की रामलीला से पुरातन जान पड़ता है। पौराणिक काल से ही राम कथा का ढोल की 18 तालों पर मुखौटा नृत्य के साथ पैंनखंडा के गांवों में रम्माण का मंचन किया जा रहा है। वहीं क्षेत्र के सलूड़-डुंग्रा गांव में आयोजित होने वाली रम्माण को यूनेस्को की ओर से विश्व धरोहर के रुप में भी संरक्षित किया गया है। साथ ही रामलीला मंचन की अपनी विशेष शैली और स्वरुप को लेकर चमोली जनपद के द्रोणागिरी और डिम्मर में आयोजित होने वाली रामलीला अपना अलग स्थान बनाती हैं। जहंा डिम्मर की रामलीला के संस्कृत संवाद लीला अभिमंचन को विशेष बनाते हैं। वहीं द्रोणागिरी में रामलीला में रामभक्त हनुमान की लीला का अभिमंचन न किया जाना लीला को अलग बनाता है।
चमोली जिला मुख्यालय पर भी रामलीला मंचन की परम्परा 80 वर्ष पुरानी मनानी जाती है। हालांकि वर्तमान में नगर क्षेत्र में गोपेश्वर गांव, बस स्टैण्ड, कुंड कॉलोनी, कोठियालय सैंण और चमोली में रामलीला अभिमंचित की जाती है। लेकिन गोपेश्वर में सबसे लम्बे समय से गोपेश्वर गांव में रामलीला अभिमंचन का प्रमाण स्थानीय लोग देते हैं। स्थानीय निवासी और पर्यावरणविद् चंडी प्रसाद भट्ट के अनुसार रामलीला का गोपेश्वर क्षेत्र में पहली बार अभिमंचन सैंटुंणा गांव में किया गया था। जिसमें गोपेश्वर के साथ ही मंडल घाटी के गांव के ग्रामीणों ने प्रतिभाग किया था। जिसके बाद वर्ष 1939 में गोपेश्वर में भी रामलीला का मंचन शुरु किया गया। स्थानीय निवासी व पूर्व अधिशासी अधिकारी शांति प्रसाद भट्ट अनुसार गोपेश्वर में प्रथम बार 1939 में आयोजित होने वाली रामलीला का आयोजन श्री जीत राम तिवाड़ी जी के नेतृत्व में किया गया था। उन्होंने ही पहली बार रामलीला के पात्रों को अभिनय और संवाद का प्रशिक्षण दिया था। सर्वोदयी नेता और पर्यावणविद् स्वर्गीय मुरारीलाल के अनुसार गोपेश्वर में 1939 में शुरु हुए रामलीला अभिमंचन के दौरान श्री जीतराम तिवाड़ी ने व्यास (हारमोनियम मास्टर) और मथुरा सिंह बिष्ट ने तबलावादक के दायित्व का निर्वहन किया। जबकि जगत सिंह नेगी ने रावण, श्यामा दत्ता भट्ट ने दशरथ और शेर सिंह ने शूर्पनखा का अभिनय किया था। इसके साथ ही फते सिंह भंडारी ने पात्रों की रुप सज्जा के दायत्वि का निर्वहन किया। उन्होंने बताया कि रामलीला का आयोजन पूर्व में गोपीनाथ मंदिर के चौक में किया जाता रहा है।
स्थानीय निवासी विनय सेमवाल ने बताया कि 20 जुलाई 1970 में अलकनंदा नदी में आई बाढ़ के बाद चमोली जनपद मुख्यालय के गोपेश्वर स्थानांतरित हो गया था। जिसके बाद वर्ष 1971 में गोपेश्वर में रामलीला का अभिमंचन गोपेश्वर के ग्रामीणों और कर्मचारियों की ओर से संयुक्त रुप से किया गया। कहा संयुक्त रुप से आयोजित की गई रामलीला का मंचन गांव में न होकर वर्तमान में जहां जिला पंचायत कार्यालय स्थित है इस स्थान पर किया गया था। साथ ही उन्होंने बताया कि गोपेश्वर गांव की रामलीला में सूत-पात, उत्तराखंड आंदोलन और कोरोना जैसी व्याधियों के कारण निरंतरता का अभाव देखने को मिलता है। बावजूद इसके गोपेश्वर में 1939-40 के बाद रामलीला के आयोजन को प्रमाण स्पष्ट होते हैं।
विनय सेमवाल कहते हैं कि गोपेश्वर गांव की रामलीला वर्तमान में अधुनिक साज सज्जा और संचार माध्यमों से रामलीलाओं का प्रसार बढ़ा है। वहीं पूर्व में रामलीला का आयोजन मशाल गैस और लालटेन जैसे उपकरणों की रोशनी में बिना ध्वनि विस्तारक यंत्रों के उपयोग के किया जाता था। लेकिन समय के साथ-साथ संसाधनों का प्रयोग रामलीला में तेजी से बढ़ा। जिसके फलस्वरुप वर्तमान में रामलीला अभिमंचन के दौरान मंच सज्जा के लिए एलईडी स्क्रीन और संवादों के स्पष्ट श्रवण के लिए ध्वनि विस्तारक यंत्रों का उपयोग खूबसूरत तरीके से किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि पूर्व में जहां संगीत पक्ष में भी महज हारमोनियम और तबले की धुन पर पद् गाये जाते थे, वर्तमान में संगीत पक्ष ने भी रामलीला को सुंदर और सजीवता प्रदान की है।
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