सरकार हमेशा गलत और हम हमेशा सही केसे?
.......... आपदा के बाद से ही देख रहा हूँ कुछ अजीब सी चीजें हर आदमी किसी न किसी बात पर सरकार और प्रसाशन से नाराज़ है। लेकिन क्यूँ हर आदमी का मानना है की सरकार की बहुत सी गलतियां है। हाँ हैं मैं भी मानता हूँ लेकिन क्या हमारी आम आदमी की कोई गलती नहीं है, क्या आम आदमी हर सूरत मैं सही है?
ये सोचने की बात है, लेकिन हमने तो मन बना के बेठे हैं की सरकार और प्रशासन का मतलब गलत लेकिन ये सोचना गलत है, ये मेरा मानना हो सकता है। लेकिन आप भी सोचिये की क्या प्रसाशन या सरकार मैं बेठे लोगे क्या दूसरी दुनियां से आये है, नहीं वो भी इसी दुनिया के हैं। और हम मैं से है तो वो हमेशा गलत और हम हमेशा सही केसे हो सकते है। मेरा ये कहने का मतलब ये नहीं की जो हुआ सही है, सरकार और प्रशासन से ज्यादा गलतियाँ हुई हैं और वो जिम्मेदार है तो गलती बड़ी है। लेकिन ये नहीं की जनता की कम है। ये दावे से लिस्लिये कह रहा हूँ क्यूंकि जनता ने भी तो वो गलतियाँ की जो उसे नहीं करनी चहिये थी। उसने नदियों की सरहदों मैं घुसपेठ की नदियों को आपने फायदे के लिए बाँधा, आपनी सुख सुविधा के लिए उसका बलात्कार करने से भी नहीं चुके, टनों मलबा उसके रास्तों पर सडक, बाँध और विकास के नाम पर उसके रास्तों मैं डाल दिया। तो उन्मुक्त नदियाँ भी नाराज़ हो गयी और उसने थोड़ी से नाराजगी जाहिर की तो हम सब खुद को सही साबित करने की अंधी दौड़ मैं कभी सरकार को कभी प्रशासन की गलतियाँ गिनाने लगे, लेकिन हम अपनी गलतियों को भूल गए की हम अपनी ज़मीन को छोड़ कर आसमानों पर उड़ने की कोशिश कर रहे हैन. लेकिन भूल गए की जो दौड़ हम दौड़ रहे हैं। उस मैं किसी गलती की कोई गुंजाईश नहीं है, गलती का मतलब मौत है। जो हुआ और हम अपनों को गँवा बेठे।
आपको लग रहा होगा कुछ अलग लगने की चाहत मे मैं ये सब लिखे जा रहा हूँ लेकिन ये नहीं है। क्यूंकि मेने गौर किया कुछ उन बातों पे जिनको हम लगभग भूल चुके हैं, हमारे पूर्वजों के जीने के तौर तरीके उनकी बसावट का आधार और नजाने क्या-क्या जो हम भूल चुके हैं। और ये तो सब जानतें है। जो लोग ज़मीन छोड़ देते हैं उनके जीने का वक्त भी कम ही होता है। तो ये हुआ हम अपनी ज़मीन छोड़ चुके है। अगर अब भी नहीं संभले लतो फिर जो होगा वो इससे कंही ज्यादा और भयानक होगा
आखिर मैं मुझे नेगी जी के गीत की कुछ पंक्तिया याद आती हैं।
---- अभी बी चेती जावा चूचो धे लगांडी गंगा जी, माता दुधे लाश बी नि राखी जाडी गंगा जी
----- लाड, प्यार, ममता तेरी नि पछयांडि गंगा जी, माता दुधे लाश बी नि राखी जाडी गंगा जी
ये सोचने की बात है, लेकिन हमने तो मन बना के बेठे हैं की सरकार और प्रशासन का मतलब गलत लेकिन ये सोचना गलत है, ये मेरा मानना हो सकता है। लेकिन आप भी सोचिये की क्या प्रसाशन या सरकार मैं बेठे लोगे क्या दूसरी दुनियां से आये है, नहीं वो भी इसी दुनिया के हैं। और हम मैं से है तो वो हमेशा गलत और हम हमेशा सही केसे हो सकते है। मेरा ये कहने का मतलब ये नहीं की जो हुआ सही है, सरकार और प्रशासन से ज्यादा गलतियाँ हुई हैं और वो जिम्मेदार है तो गलती बड़ी है। लेकिन ये नहीं की जनता की कम है। ये दावे से लिस्लिये कह रहा हूँ क्यूंकि जनता ने भी तो वो गलतियाँ की जो उसे नहीं करनी चहिये थी। उसने नदियों की सरहदों मैं घुसपेठ की नदियों को आपने फायदे के लिए बाँधा, आपनी सुख सुविधा के लिए उसका बलात्कार करने से भी नहीं चुके, टनों मलबा उसके रास्तों पर सडक, बाँध और विकास के नाम पर उसके रास्तों मैं डाल दिया। तो उन्मुक्त नदियाँ भी नाराज़ हो गयी और उसने थोड़ी से नाराजगी जाहिर की तो हम सब खुद को सही साबित करने की अंधी दौड़ मैं कभी सरकार को कभी प्रशासन की गलतियाँ गिनाने लगे, लेकिन हम अपनी गलतियों को भूल गए की हम अपनी ज़मीन को छोड़ कर आसमानों पर उड़ने की कोशिश कर रहे हैन. लेकिन भूल गए की जो दौड़ हम दौड़ रहे हैं। उस मैं किसी गलती की कोई गुंजाईश नहीं है, गलती का मतलब मौत है। जो हुआ और हम अपनों को गँवा बेठे।
आपको लग रहा होगा कुछ अलग लगने की चाहत मे मैं ये सब लिखे जा रहा हूँ लेकिन ये नहीं है। क्यूंकि मेने गौर किया कुछ उन बातों पे जिनको हम लगभग भूल चुके हैं, हमारे पूर्वजों के जीने के तौर तरीके उनकी बसावट का आधार और नजाने क्या-क्या जो हम भूल चुके हैं। और ये तो सब जानतें है। जो लोग ज़मीन छोड़ देते हैं उनके जीने का वक्त भी कम ही होता है। तो ये हुआ हम अपनी ज़मीन छोड़ चुके है। अगर अब भी नहीं संभले लतो फिर जो होगा वो इससे कंही ज्यादा और भयानक होगा
आखिर मैं मुझे नेगी जी के गीत की कुछ पंक्तिया याद आती हैं।
---- अभी बी चेती जावा चूचो धे लगांडी गंगा जी, माता दुधे लाश बी नि राखी जाडी गंगा जी
----- लाड, प्यार, ममता तेरी नि पछयांडि गंगा जी, माता दुधे लाश बी नि राखी जाडी गंगा जी
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