बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ.... पर कैसे?
??????? बेटियों को बचाने और पढ़ाने को लेकर पूरे राष्ट्र में कोलाहल चरम पर है। इस नारे को लेकर लोग संजीदा भी दिखते हैं, .............लेकिन चमोली जनपद में इस नारे को लेकर जिम्मेदार पदों पर आसीन """""""बेटियों"""""" की संजीदगी अब कटहरे में आ खड़ी हो गयी है।
क्योंकि यँहा एक प्रकरण में लिखित शिकायत के बावजूद एक महिला एस आई, एक महिला एसडीएम और एक महिला एसएसपी की ज़िले में तैनाती के बावजूद एक बच्ची को इंसाफ दिलाने के लिये लोगों को गिरफ्तारी देनी पड़ रही है, विरोध करना पड़ रहा है। और अधिकारी जांच की बात कहकर ज़िम्मेदारी से मुंह छिपाते से लग रहे हैं। तो क्या कर्तव्य परायणता के इन तौर तरीकों से बेटियों के लिए गढ़े गए इस नारे को परवाज लग पाएंगे? ये बड़ा सवाल -""""""बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ,"""""""महिला सुरक्षा कानूनों"""""""""और हमारे """"""""""समाज की खोखली दलीलों व दावों""""""""को भी कटहरे में खड़ा कर रहा है।
....क्योंकि वर्तमान के पूरे सिस्टम और मामले के हिसाब से ये मामला ज़िले के स्तर तक का महसूस नहीं होता, तो क्या मामले में उच्च स्तर की बेटियों के प्रति संवेदनहीनता का दबाव है। आखिर क्या है वो जो एक बच्ची को इंसाफ दिलाने की राह में रोड़ा बन रहा है। क्योंकि पुलिस का राज्य में जिस प्रकार उपयोग दिख रहा है वो पुलिस की मित्रता के पक्ष को खोजने पर मजबूर करता है। यँहा शराब जैसी सामाजिक बुराई की स्थापना के लिए, आंदोलनकारियों को गिरफ्तार करने के लिए, या सरकारी मौज मस्ती में कड़ाके की ठंड झेलने के लिए किया जा रहा है। जिससे मित्र पुलिस की मित्रता किससे है? ये सवाल उठ रहा है।
....पूरे प्रकरण में शिक्षक संघ, महिला संघठनों, सामाजिक संगठनों और तथाकथित समाज के चिंतकों की खामोशी भी कष्टदायक है। शिक्षा विभाग द्वारा आरोपी को एक स्थान से दूसरे स्थान पर तैनाती दे दी गयी है। जनता सड़क पर है। अधिकारी कुछ कहने की स्थिति में नहीं हैं,तो बेटियों की सुरक्षा का विश्वास कैसे जागेगा??????????
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें