सवाल राजधानी का!!
... उत्तराखण्ड राज्य निर्माण के शुरुआती दौर से ही राज्य की राजधानी को लेकर जनादेश जो रहा उसे जनप्रतिनिधि जानते थे जानते हैं।
...तो राज्य गठन के लम्बे अंतराल के बाद स्थाई राजधानी को लेकर स्पष्ट स्थिति क्यों नहीं बन पा रही? क्यों पहाड़ी राजधानी को लेकर जनप्रतिनिधि ""बहानों की इबारतों"" की ओट ले रहे?
………राजधानी को दो हिस्सों में बांटना क्या राज्य के हित में होगा?
………कंही प्रशासन के तेज और चतुर अधिकारी व जन प्रतिनिधि ऋतुओं के आधार पर राजधानी का वर्गीकरण कर भ्रष्टाचार की खेती की नई आधारशिला तो नहीं रख रहे?
.......ये उन सभी राज्यवासियों को सोचना होगा जो किसी भी रूप में राज्य के निर्माण के महायज्ञ का हिस्सा बना, क्योंकि देर से चिंतन करने की कीमत राज्य निर्माण के बाद से कई मर्तबा हम दे चुके हैं। अगर वक्त पर जनता ने सही चिंतन किया होता और शुरुआत में राज्य केंद्र शासित बनता तो वर्तमान में राज्य के सूरत-ए-हाल कुछ और होते, मगर राज्य निर्माण के लिए आहुति देने के बाद राज्य के ढांचे के निर्माण का ज़िम्मा जनप्रतिनिधियों के हाथों छोड़ दिया गया, जिससे राज्य जो बना वो स्थिति हमारे सामने है।
……इस सब में चमोली के अगवा बने पक्ष और विपक्ष के जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है, कि गैरसैंण राजधानी निर्माण की परिकल्पना को लेकर वो स्थानीय जनता और आसपास के जिलों को लामबंद क्यों नहीं कर पा रहे? क्या उनको गैरसैंण स्थाई राजधानी बनने के दूरगामी लाभ नज़र नहीं आ रहे या उनमें जनता को लामबंद करने और नेतृत्व करने की क्षमता नहीं रही? क्या जनप्रतिनिधियों के लिए राज्य आंदोलन के शहीदों और जनता की स्वीकारोक्ति से अधिक अपने आला नेताओं की खुशी और नाराजगी मायने रखती है?????
……और ऐसा नहीं कि इस मुद्दे पर जनप्रतिनिधि ही लापरवाह हैं,, जनता और आंदोलनकारियों की परवाह भी गाल बजाने तक सिमट गई है। कुछ आंदोलनकारियों को साल के 365 दिनों में 5-6 दिन गैरसैंण राजधानी बनाये जाने की याद आती है, और गिरफ्तारी, कुछ देर टीवी पर बहस कर अपनी परवाह जता रहे हैं, एक दो जन प्रतिनिधि विधानसभा भवन निर्माण का श्रेय लेने को लेकर अपनी पूरी ताकत झोंके हुए हैं।
……हमारी भूमिका भी स्पष्ट नहीं हो पा रही कि हम (मीडियाकर्मी) क्या चाहते हैं। जनमत स्पष्ट न होने का आभास हमें राय नहीं बनाने दे रहा, पर फिर गैरसैंण पर कोई सुगबुगाहट शुरू होते ही, मीडिया और सोशल मीडिया पर विचार और चिंतनों की बाढ़ सी आ जाती है। लेकिन इस विषय को लेकर किसी भी प्रकार से सतत प्रयास दृष्टिगत नहीं हो रहा, जिसका प्रतिफल है कि स्थाई राजधानी का विषय राजनीति के मुद्दे से ज्यादा कुछ प्रतीत नहीं हो रहा।
……और उसकी ही बानगी है कि जो सरकार गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने की घोषणा करती है, वो ही जनता को ठगने के लिए शीतकाल में वँहा सत्र का आयोजन करती है और सत्र के आयोजन पर 10 करोड़ से अधिक की रकम खर्च कर देती है, जबकि कुछ लाख की वित्तीय व्यवस्था न होने के चलते सिर्फ चमोली जिले की करीब 100 से अधिक सड़कें अधर में लटकी हुई हैं।
……तो ऐसे में स्थाई राजधानी पर सरकार, जनता और सबकी राय ही इस मुद्दे को ढुलमुल बनाये है।
!!जय उत्तराखण्ड!!
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