Beti

आजाद परिंदा सा था मैं तो,
कैद किया तुमने मुझको।
यारों की यारी छूट गई,
छूट गया वो अल्हड़पन,
जब से जीवन में आकर,
कैद किया तुमने मुझको।
अच्छी लगती,
ये कैद तुम्हारी अब मुझको।
जब थके हुए मेरे तन को,
तुम हौले से सहलाती हो,
मेरे घर आने की आहट पर,
देहरी पर आ जाती हो।
छोटे छोटे कदमों से आकर,
सीने से लग जाती हो।
थकन दूर हो जाती है,
जब तुम मुझे देख मुस्काती हो।
खुशियां मिलती तीन जँहा की,
जब तुतला कर पापा पापा कहती हो।

---- लापरवाह

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