वो
जब छोड़छाड़ बाबुल का घर वो मेरे घर आंगन आई।
उसके आने के संग ही घर आंगन में खुशहाली आई।
उसने स्वीकार किया संग चलना तो,
तो जीवन में इंद्र धनुष की रंगत आई।
मेरी कमियों और खूबी को सहर्ष आत्मसात किया उसने।
सुख के साथ मेरे गमों को भी अपना बना लिया उसने।
मेरे अश्कों को उसने अपनी पलकों से छिपा लिया।
जीत मिली जो जीवन में तो, होली दिवाली बना दिया।
----लापरवाह
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