उजाले छल रहे हैं...

उजाले छल रहे हैं यहां और  अंधेरे साथ  देते हैं। 
कैसा दौर-ए-उल्फत है, कि इश्क नफरतों से है।।

दिलों में सबके छलावा है, निगाहें  सब  फरेबी हैं।
यँहा सब गैर हो गए अपने, पराए लगते अपने हैं।।

हुकूमत कर रही है नफ़रत, फकीरी में  मुहब्बत है।
बाजार-ए-सियासत है ये कि जयचन्दों की मंडी है।।

हर आंख में शोले हैं, दिलों  में आग जलती है। 
ये उनवान है अपना या खात्मे की ये तैयारी है।।

उजाले छल रहे हैं यहां और  अंधेरे साथ  देते हैं। 
कैसा दौर-ए-उल्फत है, कि इश्क नफरतों से है।।

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