अब जीते नहीं हैं हम....

महज दस्तूर जिंदगी के निभा रहे हैं हम।
सच है कि जिंदगी अब जीते नहीं हैं हम।।

चल रहे हैं रोज नदी के दो किनारों की तरह।
अब कभी अपने आप से मिलते नहीं हैं हम।।

अदब भी है बहुत  और  फिक्रमन्दी  भी है मगर।
अब अपने दिल की चाह को जताते नहीं हैं हम।।

दीवार सी खड़ी है जिसे, गिरा नहीं पा रहे हैं हम।
अब कभी  अपने  आप  से  मिलते  नहीं हैं हम।।

चाहत के संग सलीका भी जानते हैं, लेकिन।
अब दिल की चाहत को जताते नहीं हैं हम।।

साथ चल रहे हैं मगर हमराह नहीं हैं हम।
जिंदगी से अब कभी मिलते नहीं हैं हम।।

कैसी आपाधापी है  और  कँहा जा  रहे हैं हम।
चाहत में खुशी की खुद से मिलते नहीं हैं हम।।

कैसा ख़ाब पाले हैं और क्या जिंदगी जी रहे हैं हम।
जिंदगी तो यँहा है मगर न जाने कँहा जा रहे हैं हम।।



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