तेरे किरदार में ढल रहा हूँ मैं...
हौले-हौले ही सही तेरे किरदार में ढल रहा हूँ मैं।
गुजरी है उम्र अब जिंदगी तुझे समझ रहा हूँ मैं।।
तेरे सफर के कारवां ने बहुत कुछ सीखा दिया।
तेरे दिए तजुर्बे से दोस्त-दुश्मन चुन रहा हूँ मैं।।
जो कल तलक बने फिरते थे हमारे खैरख्वाह।
हाथ में आज उनके ही शमशीर देख रहा हूँ मैं।।
पहुंचा हूँ आज जब मैं जवानी के इस मोड़ पर।
ठोकरों का भी नफ़ा नुकसान समझ रहा हूँ मैं।।
इस सफर में बहुत मिले लफ्जों के कारसाज़।
तेरे दिए हुनर से अब उनको परख रहा हूँ मैं।।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें