आस की मुछ्याळी
ख़ैरि का दिनों मां अब आस की मुछ्याळी जगो।
बीती तें बिसार दे अर भल्यारा का स्विंणा गठ्यो।।
ख़ैरि सदनी नि रौंण भुला, आस कु उज्याळु जगो।
ल्वे-पस्वे बगे की दिदा, अपणी धरती फयेर सजो।।
बोट मुठ कस कमर अर आस की मुछ्याळी जगो।
खैरांंई आस बिजाळ, अर हिकमते फसल उगो।।
यूँ दिनोंन मुख लुकांण, विस्वास की डाळी लगो।
बीती तें बिसार दे अर भल्यारा का स्विंणा गठ्यो।।
खैरी बिना जुग जगत मां सुख कु कुछ मोल नी।
धाम बिना छैल कू जन कखी क्वी मोल नी।।
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