सच कुछ ये भी है------------------

.............केदारनाथ मैं आई तबाही कई लोगों को लील गयी, कई मानों की गोद खाली कर गयी, कई बहनों के भाई निगल गयी, कई बहनों को बेवा कर गयी। दुःख हुआ, लेकिन फिर गोपीचन्द भर्तृहरी की लाइन याद आई ................

 वो कहते हैं-
माता रोये जनम-जनम को, बेंड रोए छह मासा, त्रिया रोए डेढ़ घडी को आन करे घर बास।

तो लगा की उन्होंने जो ये कहा वो कितना अजीब था क्या ये हो सकता है, लेकिन ये हो रहा है। लोग अपनों को खो चुके हैं तो बदहवास हैं लेकिन उनके मरने का शुक्रिया अदा कर रहे थे। ये देख कर मन ख़राब होने लगा, लेकिन आदतन इसके पीछे का सच जानने की कोशिश की तो जो सच मिला बहुत आजीब था। बेटा था जो कमाता था और उसके पीछे थे पांच खाने वाले। अब आप सोच रहे होंगे की ये तो और बुरा हुआ की उसके मरने से तो और भी दिकत होगी। लेकिन पिता ने जिस सच से सामना करवाया वो क्या था आपकी राय चाहता हूँ।

पिता ने कहा की बेटा मर गया तो एक ही दर्द है की वो मर गया, लेकिन अगर वो आधा अधुरा घर आता तो उसका इलाज करना हमारे बस से बाहर था और तब वो तिल तिल मरता जो इस मौत से ज्यादा बुरा होता। तो मैं उसे कहा की सरकार मदत करती इलाज़ के लिए,

तो आंसू भरी आखों से जो उस पिता ने कहा की ये तो दुनिया का सबसे बड़ा झूठ है। हो सकता है की शुरुआत के दिनों मै तो अस्पताल मैं भर्ती कर देती लेकिन बाद मैं जो होता है वो आप नहीं जानते, वो हम जानते हैं जिनका कोई बड़ा आदमीं जान्ने वाला नहीं है. की ऑफिसों मैं क्या होता है। ये हम जानते हैं आप नहीं,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

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