सियासत पहाड़ आएगी
फिर से सियासत पहाड़ चढ़ेगी,
खाएगी, पीयेगी फिर उतर जाएगी।
वो ही तन्हाई होगी हिस्से में अपने,
जब सियासत मैदान लौट जाएगी।।
ठगा है हर बार सियासत ने हमें,
इस बार भी ठग के लौट जाएगी।
कँहा मायने हैं सियासत में ज़बान के,
बेशर्म है वो वादा करके मुकर जाएगी।
तेरी आंखों की लाली उसे न डरा पायेगी,
शातिर है सियासत, वो नजर चुरा के भाग जाएगी।
फिर से सियासत पहाड़ आएगी,
खाएगी, पीयेगी फिर लौट जाएगी।
तुम सिर्फ ताकते रहना राहें उसकी,
वो आएगी फिर लौट जाएगी।
ये गैरसैंण सिर्फ मुद्दा है सियासत का,
वो फिर तुमको छलेगी और लौट जाएगी।।
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लापरवाह
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