सड़क दुर्घटनाओं से बिलबिलाते पहाड़.......
...दो दशक से भी अधिक समय पहले उत्तराखण्ड के जागरूक और यायावरी पत्रकार "'"जयदीप"" ने """ सड़क दुर्घटनाओं से बिलबिलाते पहाड़"" नाम के शीर्षक के साथ सड़क सुरक्षा पर सवाल उठाती एक खबर लिखी थी। खबर में करीब एक दशक में पहाड़ी क्षेत्र में हुई दुर्घटना के ब्यौरे के साथ दुर्घटना के कारणों के विवरण था। जिसमें सड़कों की खराब स्थिति, सड़कों पर सुरक्षा उपकरण (क्रस बैरियर, स्टील गार्डर) की कमी, ओवर लोडिंग, नशे में वाहन चलाने जैसे कारणों को इंगित किया गया था।
लेकिन ताज्जुब तब होता है, जब दो दशक बाद भी जब सड़क निर्माण किसी भी सरकार और जन प्रतिनिधि की बड़ी उपलब्धि के रूप में देखी जा रही है। जब सड़क निर्माण की स्वीकृती से सड़क पर वाहन संचालन तक कि खबरों को नेता अपने विकास की गाथा के रूप में जनता के बीच रख रहे हैं। ऐसे में सड़क सुरक्षा आज भी किसी तरह से प्राथमिक समस्या नहीं मानी जा रही, बशर्ते सड़क सुरक्षा को लेकर जिला प्रशासन से शासन तक हर स्तर पर बैठक कर बड़े स्तर पर आदेश और निर्देश जारी किए जा रहे हैं। लेकिन इन आदेशों के क्रियान्वयन की मॉनिटरिंग की कोई व्यवस्था नहीं है।
जिसका खामियाजा टैक्स देने वाली जनता को धुमाकोट क्षेत्र में हुई हृदयविदारक बस दुर्घटना के रूप में मिलती है। लेकिन कोई भी क्या सरकार, क्या प्रशासन, क्या पुलिस, क्या परिवहन विभाग और क्या हम (जनता) इसे लेकर सही मायने में संवेदनशील नहीं हो सके हैं। क्योंकि अभी तक धुमाकोट बस दुर्घटना के जो कारण सामने आए हैं वो सड़क की खस्ताहालत है, ऐसे ही कुछ दिन पूर्व पोखरी क्षेत्र में हुई एक वाहन दुर्घटना में स्टील गार्डर न लगे होने के चलते एक ही परिवार के 4 लोग काल के गाल में समा गए। और सम्पूर्णता में देखें तो अकेले जनपद चमोली में बीते एक वर्ष में एक दर्जन से अधिक बड़ी वाहन दुर्घटनाओं में सैकड़ों लोग अकाल मौत का शिकार हो चुके हैं। जबकि छोटी छोटी घटनाओं की संख्या तो इससे कंही अधिक हैं।
लेकिन इसके बावजूद सड़क सुरक्षा को लेकर शासन प्रशासन की संजीदगी का आलम यह है कि ज़िले में आज भी करीब 100 से अधिक सड़कों का परिवहन विभाग द्वारा निर्माण के बाद कई वर्षों से परीक्षण नहीं किया है। यँहा तक कि ज़िले की सर्वाधिक महत्वपूर्ण दिवालिखाल-भराड़ीसैंण सड़क भी परिवहन निगम की ओर से पास नहीं है। जबकि सड़क पर गाहे-बगाहे ही सही पर सूबे के मुखिया से लेकर आम लोग आवाजाही करते हैं। लेकिन सभी सड़कों पर निर्बाध रूप से वाहनों का संचालन होता है, जन प्रतिनिधि इन असुरक्षित सड़कों के निर्माण को अपनी उपलब्धियों के खाते में शान से दर्ज करते हैं और हादसे के वक्त सरकार मुआवजे की घोषणा करती है। सत्ता और विपक्ष संवेदना व्यक्त कर देते हैं और जनता भी इन सबके बाद कुछ ही दिनों के बाद दुर्घटनाओं में जिंदगी खो चुके लोगों को भूलकर, फिर इन असुरक्षित सड़कों पर जान की परवाह किये बिना आवाजाही शुरू कर देते हैं।
सड़क निर्माण और रक-रखाव के लिए ऐसा नहीं कि सरकार की ओर से धनराशि ख़र्च नहीं कि जाती की जाती है, लेकिन उसके बाद भी परिणाम सिफर ही रहते हैं। मेरी याद में जँहा गोपेश्वर-पोखरी मोटर मार्ग पर 2014 से 16 के बीच 2 करोड़ की धनराशि खर्च की गई। लेकिन वर्तमान में उक्त सड़क की स्थिति यह है कि सड़क कब किस जगह पर आखरी सफर पर ले जाये कहा नहीं जा सकता। नन्दप्रयाग-घाट सड़क पर भी करोड़ों रुपये खर्च किये जाने का दावा किया जाता है। लेकिन सड़क की स्थिति दयनीय बनी हुई है। इसके अलावा जिले के लिंक सड़कों पर तो ग्रामीण भगवान के भरोसे ही आवाजाही कर रहे हैं। लेकिन इन सड़कों से अक्सर आवाजाही करने वाले जन प्रतिनिधि भी इन सड़कों को सुरक्षित करने को लेकर संजीदा नहीं दिखते। ग्रामीण कभी कभी याद आने पर दबाव बनाने की कोशिश करते हैं। पर फिर कुछ दिनों तक रोने चिल्लाने के बाद कोरे आश्वासनों के साथ उसी असुरक्षित सड़क पर आवाजाही शुरू कर देते हैं।
फिर कोई हादसा होता है, हम मृतकों की संख्या सुनकर अंदर तक हिल जाते हैं, आवेश में आते हैं सब एक दूसरे को कोसते हैं। फिर इसे भाग्य पर छोड़ कर फिर .... सड़क दुर्घटनाओं से पहाड़ के फिर बिलबिलाने तक खामोश हो जाते हैं।
------क्या दुर्घटनाओं के लिए प्रशासन, पुलिस, परिवहन निगम और सड़क के लिये जिम्मेदार विभागों के अधिकारियो की जिम्मेदारी तय नहीं होनी चाहिए?
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