संदेश

.................सरकार बेहतर काम कर रही है सुनने और समझने में कष्ट हो रहा है

........बीते कुछ समय से राज्य में न्यायालय का काम बढ़ता दिख रहा है, राज्य में जँहा मुख्यमंत्री और मंत्री मेलों में शामिल होने और चाय-जलेबी के रसास्वादन में जूटे हैं। वंही सरकार के अलग-अलग विभागों के आंदोलन हों या नियुक्ति का मामला मुखिया न्यायालय के जरिये साध रहे हैं। ऐसे में सरकार बेहतर काम कर रही है सुनने और समझने में कष्ट हो रहा है और ये सरकार के कामकाज की क्षमता पर भी संशय पैदा कर रहा है।

...................विचारों के नकल करने का भी खूब चलन हो निकला है।

...............सोशल मिडिया से जन्हा विचारों के प्रसारण को बेहतर और तेज माध्यम मिला है, वन्ही विचारों के अनुसरण के बजाय विचारों के नकल करने का भी खूब चलन हो निकला है। कई बार समाज में बौद्धिक प्रतिमान बन चुके साथी भी स्वयं को इस चलन से अलग नहीं रख पा रहे। कल ही मैं भी इस चलन से ग्रस्त हो गया और अपने एक प्रेरक व्यक्तित्व की समझ और विचार की नकल कर बैठा मगर सौभाग्य से मुझे सिखाने वाले लोगों की अच्छी तादाद है तो मैंने स्वयं को ठीकठाक कर लिया। और खुद को ठीकठाक रखने और करने के लिए मैं अपने सभी साथियों का सदैव आभारी रहूँगा और सदैव साथियों से इस प्रकार के समर्थन और सहयोग की अपेक्षा करूँगा।
………उसके बाद यंहा रहेगा कूड़ा और अप्सिस्ट सुना है गैरसैण इन दिनों हाईटेक सिटी मैं कन्वर्ट हो रहा है, गैरसैण मैं लाखों की लागत से विधान सभा का तम्बू लगाया जा रहा है. साथ ही मंत्री और संतरियों के लिए भी टेंट लग रहे हैं. पुलिस के साथ पी ऐ सी भी यंहा आ रही है. लेकिन विधान सभा का ये नाटक ख़त्म होते ही ये सब ठाट बाट भी देहरादून चला जाएगा, और उसके बाद यंहा जो रहेगा वो होगा कूड़ा और अप्सिस्ट राज्य सरकार ने आने की तो पूरी योजना बताई और ये भी दावा कर दिया की खर्च एक करोड़ से कम होगा, पर सत्र के बाद फैले कूड़े और अप्सिस्ट के निस्तारण की कोई योजना नहीं बनायीं है. जो अभी नहीं सोचा गया तो बाद में गैरसैण मैं महामारी फैलने की स्थिति पैदा होगी। मेरा ये लिखने के पीछे किसी प्रकार से डर फैलाने का मकसद नहीं है. लेकिन तजुर्बा बताता है की जिस शहर या गांव मैं बड़े आयोजन होते हैं वंहा आयोजन तक तो सब ठीक रहता है। लेकिन आयोजन के बाद जो होता है वो स्थानीय लोगों को भुगतना होता है.  इस बात का यदि जीवंत उदाहरण देखना हो तो तीर्थयात्रा ख़त्म होने के बाद यात्रा पड़ावों पर देखा जा सकता है. क्योंकि यात्रा शुरू होने के ...

विकासवाद के नये पैक मैं, परिवर्तन का है युग आया।

विकासवाद के नये पैक मैं, परिवर्तन का है युग आया।  पेड़ों कि झुरमुट सिमटी और कंक्रीट का जंगल उग आया।  क्रांति हुई और अपनों से नाता टूट गया और हाथों में मोबाईल आया।  विकासवाद के नये पैक मैं, परिवर्तन का है युग आया।  धर्म ध्वजा के पोषक के कन्धों पर सवार हो कामदेव आया।  और संत, फकीरों कि कुटिया से, काम शास्त्र का फतुआ आया।  विकासवाद के नये पैक मैं, परिवर्तन का है युग आया। 

अब नदी खामोश हैं।

भ्रष्ट तंत्र की खामियों का अब पुलिंदा खुल गया, गुलज़ार गांव शहरों मैं अब बियावा रह गया। सरहदें अपनी बता कर अब नदी खामोश हैं।  कंक्रीट के जंगलों मैं अब मलबे का अम्बार रह गया।

फिरकापरस्ती

नादाँ हैं वो लोग जो कहते हैं की मैं फिरकापरस्ती पे नहीं लिखता, लिखता हूँ मैं फिरकापरस्ती पर, बस मजहबों की फिरकापरस्ती पे नहीं लिखता.

....... तो मौत कि सड़कों से गुजरगी इस बार बद्री-केदार कि यात्रा

दो  दिन पहले बदरीनाथ यात्रा मार्ग देखने का मौका मिला, तो आश्चर्य हुआ कि हमारी सरकार बद्रीनाथ कि यात्रा इस रास्ते से शुरू करने कि तैयारी कर रही जिस सड़क को आठ माह मैं सीमा सड़क संगठन नहीं बना पाया।  उसे लोक निर्माण विभाग डेढ़ माह मैं बना देगा ये कह रहे थे।  प्रदेश के मुख्य सचिव सुभाष कुमार। हंसी आ रही थी ये सोच कर कि पिछली दिक्क़त खत्म हुए। अभी साल भी नहीं हुआ और हमारी सरकार और नोकरशाह उसे भूल कर नयी दिक्क़त को न्योता दे रहे है।  इस पर भी सब लोगो के अपने अपने विचार हैं।  जंहा व्यापारी इसे सरकार कि अच्छी पहल बता रहे हैं।  वंही जो लोग आपदा को झेल चुके हैं।  उनका मानना है कि  इस हालात मैं यात्रा शुरू कि जाती है तो पिछली परेशानी कि पुनरावृत्ति हो सकती है। लेकिन जून मैं लोकसभा चुनाव है और पुरे देश मैं  कांग्रेस के खिलाफ एंटी कम्बेन्सी फेक्टर हावी है और उस पर प्रदेश के नए मुखिया ने तीन सीटों पर पार्टी के प्रत्याशियों को जीताने का दावा भी कर डाला है। ऐसे मैं मुखिया को अपनी कुर्सी बचाने के लिए कुछ तो करना है। सो यात्रा ही शुरू करना ठीक होगा क्यूंकि रा...