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विकासवाद के नये पैक मैं, परिवर्तन का है युग आया।

विकासवाद के नये पैक मैं, परिवर्तन का है युग आया।  पेड़ों कि झुरमुट सिमटी और कंक्रीट का जंगल उग आया।  क्रांति हुई और अपनों से नाता टूट गया और हाथों में मोबाईल आया।  विकासवाद के नये पैक मैं, परिवर्तन का है युग आया।  धर्म ध्वजा के पोषक के कन्धों पर सवार हो कामदेव आया।  और संत, फकीरों कि कुटिया से, काम शास्त्र का फतुआ आया।  विकासवाद के नये पैक मैं, परिवर्तन का है युग आया। 

अब नदी खामोश हैं।

भ्रष्ट तंत्र की खामियों का अब पुलिंदा खुल गया, गुलज़ार गांव शहरों मैं अब बियावा रह गया। सरहदें अपनी बता कर अब नदी खामोश हैं।  कंक्रीट के जंगलों मैं अब मलबे का अम्बार रह गया।

फिरकापरस्ती

नादाँ हैं वो लोग जो कहते हैं की मैं फिरकापरस्ती पे नहीं लिखता, लिखता हूँ मैं फिरकापरस्ती पर, बस मजहबों की फिरकापरस्ती पे नहीं लिखता.

....... तो मौत कि सड़कों से गुजरगी इस बार बद्री-केदार कि यात्रा

दो  दिन पहले बदरीनाथ यात्रा मार्ग देखने का मौका मिला, तो आश्चर्य हुआ कि हमारी सरकार बद्रीनाथ कि यात्रा इस रास्ते से शुरू करने कि तैयारी कर रही जिस सड़क को आठ माह मैं सीमा सड़क संगठन नहीं बना पाया।  उसे लोक निर्माण विभाग डेढ़ माह मैं बना देगा ये कह रहे थे।  प्रदेश के मुख्य सचिव सुभाष कुमार। हंसी आ रही थी ये सोच कर कि पिछली दिक्क़त खत्म हुए। अभी साल भी नहीं हुआ और हमारी सरकार और नोकरशाह उसे भूल कर नयी दिक्क़त को न्योता दे रहे है।  इस पर भी सब लोगो के अपने अपने विचार हैं।  जंहा व्यापारी इसे सरकार कि अच्छी पहल बता रहे हैं।  वंही जो लोग आपदा को झेल चुके हैं।  उनका मानना है कि  इस हालात मैं यात्रा शुरू कि जाती है तो पिछली परेशानी कि पुनरावृत्ति हो सकती है। लेकिन जून मैं लोकसभा चुनाव है और पुरे देश मैं  कांग्रेस के खिलाफ एंटी कम्बेन्सी फेक्टर हावी है और उस पर प्रदेश के नए मुखिया ने तीन सीटों पर पार्टी के प्रत्याशियों को जीताने का दावा भी कर डाला है। ऐसे मैं मुखिया को अपनी कुर्सी बचाने के लिए कुछ तो करना है। सो यात्रा ही शुरू करना ठीक होगा क्यूंकि रा...
पांच साल मैं फिर से लौटा लोकतान्त्रिक त्यौहार चेहरे पर मायूसी लेकर नेता आया आज हमारे द्वार करता फिर से नयी घोषणा और देता उपहार देख चुनावी द्वन्द खड़ा तो बदल गया व्यवहार पांच साल मैं फिर से लौटा लोकतान्त्रिक त्यौहार  चेहरे पर मायूसी लेकर नेता आया आज हमारे द्वार उड़न खटोले, मोटर छुटी और छोड़ दिया घरबार आज नमन करते हैं सबको और करते सत्कार पांच साल मैं फिर से लौटा लोकतान्त्रिक त्यौहार चेहरे पर मायूसी लेकर नेता आया आज हमारे द्वार हाथ जोड़कर कहता जीने की आज़ादी दूंगा और दूंगा आहार रोजगार के नए मापदंड और दूंगा व्यापार पांच साल मैं फिर से लौटा लोकतान्त्रिक त्यौहार चेहरे पर मायूसी लेकर नेता आया आज हमारे द्वार यही वक्त है यही है मोका तू करले गहन विचार नयी सोच और नए मनन से दे नव भारत को आधार

सरकार हमेशा गलत और हम हमेशा सही केसे?

.......... आपदा के बाद से ही देख रहा हूँ कुछ अजीब सी चीजें हर आदमी किसी न किसी बात पर सरकार और प्रसाशन से नाराज़ है। लेकिन क्यूँ हर आदमी का मानना है की सरकार की बहुत सी गलतियां है। हाँ हैं मैं भी मानता हूँ लेकिन क्या हमारी आम आदमी की कोई गलती नहीं है, क्या आम आदमी हर सूरत मैं सही है? ये सोचने की बात है, लेकिन हमने तो मन बना के बेठे हैं की सरकार और प्रशासन का मतलब गलत लेकिन ये सोचना गलत है, ये मेरा मानना हो सकता है। लेकिन आप भी सोचिये की क्या प्रसाशन या सरकार मैं बेठे लोगे क्या दूसरी दुनियां से आये है, नहीं वो भी इसी दुनिया के हैं। और हम मैं से है तो वो हमेशा गलत और हम हमेशा सही केसे हो सकते है। मेरा ये कहने का मतलब ये नहीं की जो हुआ सही है, सरकार और प्रशासन से ज्यादा गलतियाँ हुई हैं और वो जिम्मेदार है तो गलती बड़ी है। लेकिन ये नहीं की जनता की कम है। ये दावे से लिस्लिये कह रहा हूँ क्यूंकि जनता ने भी तो वो गलतियाँ की जो उसे नहीं करनी चहिये थी। उसने नदियों की सरहदों मैं घुसपेठ की नदियों को आपने फायदे के लिए बाँधा, आपनी सुख सुविधा के लिए उसका बलात्कार करने से भी नहीं चुके, टनों मलबा उस...

सच कुछ ये भी है------------------

.............केदारनाथ मैं आई तबाही कई लोगों को लील गयी, कई मानों की गोद खाली कर गयी, कई बहनों के भाई निगल गयी, कई बहनों को बेवा कर गयी। दुःख हुआ, लेकिन फिर गोपीचन्द भर्तृहरी की लाइन याद आई ................  वो कहते हैं- माता रोये जनम-जनम को, बेंड रोए छह मासा, त्रिया रोए डेढ़ घडी को आन करे घर बास। तो लगा की उन्होंने जो ये कहा वो कितना अजीब था क्या ये हो सकता है, लेकिन ये हो रहा है। लोग अपनों को खो चुके हैं तो बदहवास हैं लेकिन उनके मरने का शुक्रिया अदा कर रहे थे। ये देख कर मन ख़राब होने लगा, लेकिन आदतन इसके पीछे का सच जानने की कोशिश की तो जो सच मिला बहुत आजीब था। बेटा था जो कमाता था और उसके पीछे थे पांच खाने वाले। अब आप सोच रहे होंगे की ये तो और बुरा हुआ की उसके मरने से तो और भी दिकत होगी। लेकिन पिता ने जिस सच से सामना करवाया वो क्या था आपकी राय चाहता हूँ। पिता ने कहा की बेटा मर गया तो एक ही दर्द है की वो मर गया, लेकिन अगर वो आधा अधुरा घर आता तो उसका इलाज करना हमारे बस से बाहर था और तब वो तिल तिल मरता जो इस मौत से ज्यादा बुरा होता। तो मैं उसे कहा की सरकार मदत करती इलाज़ ...