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न्यायालय, आबकारी विभाग और प्रशासन का आबकारी प्रेम

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..…...चमोली जिले में प्रशासन के आबकारी विभाग के प्रति प्रेम चरम पर है। यंहा प्रशासन ने इस प्रेम के चलते सरवोच्च न्यायालय के आदेशों को भी ठेंगा दिखाने में गुरेज नहीं कि है। जिस...

घुण्ड घुण्डों फुक्या........

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.....घुण्ड घुण्डों फुक्या, पर कुतरयांण कख बे ओंणी? (घुटनों घुटनों तक जल गए पर फिर भी बदबू कँहा से आ रही?) ये कहावत हमारे उत्तराखण्ड में आमतौर पर घर गांवों में बुजुर्ग लोग गलती पर गल...

''आपणा बल्दो सी मार्युं''

हमारी बोली में एक कहावत है- ''आपणा बल्दो सी मारयूँ'' जिसका भावार्थ है की अपने बैल के मारने पर आप गुस्सा भी नही कर पाते. तो उडी की घटना के बाद कुछ लोगों की स्थित ि ऐसी हो गयी है क्योंकि जब सत्ता से दूर थे तो देश के एक बड़े राष्ट्रभक्त जमात ने बिना ''प्रधानमन्त्री'' पद की गरिमा की फ़िक्र किये कालेज पालिटिक्स की तरह बड़ी बड़ी बातें कही उसके बाद जब मैदान में आये तो ''1 के बदले कुछ 11 के अनुपात'' में काम करने काम करने का दावा किया लेकिन ये क्या जब साबित करने की बात आई तो " कूटनीति, संयुक्त राष्ट्र संघ और विश्व में राष्ट्र की विश्वसनीयता" का '' बुलेट प्रूफ'' कवच पहन लिया है. जबकि वर्तमान में राष्ट्रभक्ति की शब्द पुरोधा जमात के एक वरिष्ठ योद्धा ने 1 टीवी शो में एंकर के एक सवाल पर कुछ ''शठे शाठ्यम समाचरेत'' ''जैसे को तैसा'' सा कुछ कहा था. पर अब पूरी जमात इन जुमलों पर अमल करने से कतरा रही है. तो ये जुमलों की राजनीति और कूटनीति कैसे राष्ट्र और राष्ट्रवाद को बचाएगी ये सवाल उ...

.................है ना अजीब?

... जब कभी आपके आसपास की किसी चीज की अचानक कीमत बढ़ती है और आपकी चीज की कीमत बढ़ना तो छोड़ो उसके नाम भी धरातल से खत्म होनी शुरू होती है तो आपको उसकी सही वक्त पता लगती है। वैसे ही राज्य की राजनीति में जनप्रतिनिधियों की स्थिति नज़र आती है। डेढ़ दशक से लगातार राज्य को आयुष प्रदेश, पर्यटन प्रदेश और भी नाम जो याद में भी नहीं से प्रचारित किया जा रहा है पर ताज्जुब की किसी भी नाम पर रत्ती भर काम नहीं हुआ। लेकिन हर पांच साल में ये सब फिर याद आ जाता है। क्योंकि अपने किये कामों की कोई क ीमत नहीं रह जाती। बड़ा सवाल की राज्य बनने के बाद जिनकी तेज़ी से तरक्की हुई वो कौन हैं?क्या कभी चाय की दूकान पर अखबार उलटते किसी ताऊ, भाई, ताई, मौसी या कोई भी जिसने राज्य निर्माण में "कोदा झंगोरा खायेंगें, उत्तराखण्ड बनाएंगे" "आज दो अभी दो उत्तराखण्ड राज्य दो" जैसे नारे लगाये ने सोचने की कोशिश की? लगता नहीं की किसी ने भी सोचा चार लोग चाय की दूकान पर या किसी गोष्ठी में बैठकर शराब पीकर बन्द होने वाले को राज्य आंदोलनकारी होने पर कोसता है। या फिर अधिकारी और नेता को गरिया कर अपनी किस्म...

.................सरकार बेहतर काम कर रही है सुनने और समझने में कष्ट हो रहा है

........बीते कुछ समय से राज्य में न्यायालय का काम बढ़ता दिख रहा है, राज्य में जँहा मुख्यमंत्री और मंत्री मेलों में शामिल होने और चाय-जलेबी के रसास्वादन में जूटे हैं। वंही सरकार के अलग-अलग विभागों के आंदोलन हों या नियुक्ति का मामला मुखिया न्यायालय के जरिये साध रहे हैं। ऐसे में सरकार बेहतर काम कर रही है सुनने और समझने में कष्ट हो रहा है और ये सरकार के कामकाज की क्षमता पर भी संशय पैदा कर रहा है।

...................विचारों के नकल करने का भी खूब चलन हो निकला है।

...............सोशल मिडिया से जन्हा विचारों के प्रसारण को बेहतर और तेज माध्यम मिला है, वन्ही विचारों के अनुसरण के बजाय विचारों के नकल करने का भी खूब चलन हो निकला है। कई बार समाज में बौद्धिक प्रतिमान बन चुके साथी भी स्वयं को इस चलन से अलग नहीं रख पा रहे। कल ही मैं भी इस चलन से ग्रस्त हो गया और अपने एक प्रेरक व्यक्तित्व की समझ और विचार की नकल कर बैठा मगर सौभाग्य से मुझे सिखाने वाले लोगों की अच्छी तादाद है तो मैंने स्वयं को ठीकठाक कर लिया। और खुद को ठीकठाक रखने और करने के लिए मैं अपने सभी साथियों का सदैव आभारी रहूँगा और सदैव साथियों से इस प्रकार के समर्थन और सहयोग की अपेक्षा करूँगा।
………उसके बाद यंहा रहेगा कूड़ा और अप्सिस्ट सुना है गैरसैण इन दिनों हाईटेक सिटी मैं कन्वर्ट हो रहा है, गैरसैण मैं लाखों की लागत से विधान सभा का तम्बू लगाया जा रहा है. साथ ही मंत्री और संतरियों के लिए भी टेंट लग रहे हैं. पुलिस के साथ पी ऐ सी भी यंहा आ रही है. लेकिन विधान सभा का ये नाटक ख़त्म होते ही ये सब ठाट बाट भी देहरादून चला जाएगा, और उसके बाद यंहा जो रहेगा वो होगा कूड़ा और अप्सिस्ट राज्य सरकार ने आने की तो पूरी योजना बताई और ये भी दावा कर दिया की खर्च एक करोड़ से कम होगा, पर सत्र के बाद फैले कूड़े और अप्सिस्ट के निस्तारण की कोई योजना नहीं बनायीं है. जो अभी नहीं सोचा गया तो बाद में गैरसैण मैं महामारी फैलने की स्थिति पैदा होगी। मेरा ये लिखने के पीछे किसी प्रकार से डर फैलाने का मकसद नहीं है. लेकिन तजुर्बा बताता है की जिस शहर या गांव मैं बड़े आयोजन होते हैं वंहा आयोजन तक तो सब ठीक रहता है। लेकिन आयोजन के बाद जो होता है वो स्थानीय लोगों को भुगतना होता है.  इस बात का यदि जीवंत उदाहरण देखना हो तो तीर्थयात्रा ख़त्म होने के बाद यात्रा पड़ावों पर देखा जा सकता है. क्योंकि यात्रा शुरू होने के ...